“मंत्रीजी को पैसा देना है…” — रेंजर की शिकायत ने खोली वन विभाग के अंदरूनी भ्रष्टाचार और प्रताड़ना की परतें
रायपुर | संजय कश्यप कि विशेष रिपोर्ट | भंडाफोड़ न्यूज़
छत्तीसगढ़ वन विभाग में एक बार फिर वही नाम सुर्खियों में है, जो पहले भी रिश्वतखोरी के मामले में एसीबी की कार्रवाई झेल चुका है। वर्ष 2018 में उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व में एक लाख रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए तत्कालीन SDO फॉरेस्ट आर.पी. दुबे अब फिर गंभीर आरोपों के घेरे में हैं।
वर्तमान में नंदनवन पक्षी विहार में पदस्थ आर.पी. दुबे के खिलाफ इस बार विभाग के भीतर से ही खुलकर आवाज उठी है। नंदनवन के रेंजर हिमांचल साहू ने विभागीय अधिकारियों को लिखित शिकायत देकर आरोप लगाया है कि उन पर फर्जी बिल तैयार कर भुगतान कराने का दबाव बनाया जा रहा था और कथित तौर पर कहा जाता था —

“मंत्रीजी को पैसा देना है…”
इस शिकायत ने वन विभाग के भीतर चल रहे कथित भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, मानसिक प्रताड़ना और प्रशासनिक दुरुपयोग को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
पहले रिश्वत में गिरफ्तारी, अब फर्जी बिल और दबाव के आरोप
आर.पी. दुबे का नाम पहली बार विवादों में नहीं आया है। वर्ष 2018 में वे उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व, मैनपुर में SDO फॉरेस्ट के पद पर पदस्थ थे, जहां मनरेगा के तहत हुए निर्माण कार्यों के भुगतान के एवज में एक लाख रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगा था।
एसीबी रायपुर ने शिकायत मिलने के बाद मैनपुर स्थित सरकारी आवास में छापा मारकर उन्हें कथित रूप से रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया था। उस समय भी आरोप था कि ठेकेदारों के लगभग 17.72 लाख रुपये के भुगतान को रोका गया था और भुगतान के बदले कमीशन मांगा जा रहा था।
अब लगभग वही पैटर्न नंदनवन में भी दिखाई दे रहा है — फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार आरोप किसी ठेकेदार ने नहीं, बल्कि विभाग के भीतर कार्यरत एक रेंजर और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों ने लगाए हैं।
“फर्जी बिल बनाओ, मंत्रीजी को पैसा देना है”

रेंजर हिमांचल साहू की शिकायत के अनुसार, SDO आर.पी. दुबे द्वारा कई ऐसे बिल तैयार करने का दबाव बनाया जा रहा था जो नियमों के अनुरूप नहीं थे।
शिकायत में कहा गया है कि जब उन्होंने नियमों का हवाला देकर इनकार किया, तब कथित तौर पर उन्हें कहा गया —
“यह राशि मंत्रीजी को देना जरूरी है।”
यह आरोप अपने आप में बेहद गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर किस “मंत्रीजी” के नाम पर विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों पर दबाव बनाया जा रहा था?
हालांकि शिकायतकर्ता रेंजर हिमांचल साहू ने शिकायत की पुष्टि की है, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से अधिक टिप्पणी करने से परहेज किया।
“घूसखोरी नहीं कर सकते तो दूसरी नौकरी कर लो”
रेंजर की शिकायत में केवल वित्तीय अनियमितता ही नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना और अपमानजनक व्यवहार के भी आरोप लगाए गए हैं।
शिकायत के अनुसार, जब उन्होंने नियमों के अनुरूप काम करने की बात कही, तो SDO द्वारा कथित रूप से कहा गया —
“अगर इतनी ईमानदारी से काम करना है तो टीचिंग की नौकरी कर लो… यह काम तुम्हारे लिए नहीं है।”
वन विभाग के अंदर यह कथित बयान अब चर्चा का विषय बना हुआ है। कर्मचारियों का कहना है कि यह मानसिकता स्वयं इस बात का संकेत है कि विभाग में “ईमानदारी” को अयोग्यता की तरह देखा जा रहा है।
फाइल रोकना, भुगतान अटकाना और कार्यालयीन दबाव
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि विभागीय फाइलों और पत्राचार को जानबूझकर रोका जाता था, जिससे कार्य प्रभावित होते थे।
- प्राक्कलन और वाउचर समय पर अग्रेषित नहीं किए जाते थे
- कर्मचारियों को घंटों कार्यालय में बैठाकर रखा जाता था
- फील्ड निरीक्षण प्रभावित होते थे
- वेतन भुगतान में अनावश्यक देरी की जाती थी
इन आरोपों ने नंदनवन के प्रशासनिक वातावरण पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों ने भी खोला मोर्चा


मामला यहीं नहीं रुका। नंदनवन के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों ने भी डीएफओ और कलेक्टर को शिकायत सौंपकर गंभीर आरोप लगाए हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि:
- उन्हें नौकरी से निकालने और ट्रांसफर की धमकी दी जाती थी
- सार्वजनिक रूप से “निकम्मे”, “महामूर्ख”, “काम के लायक नहीं” जैसे शब्द कहे जाते थे
- निजी बंगले में काम के लिए बुलाया जाता था
- आने-जाने का पेट्रोल खर्च खुद वहन करना पड़ता था
- मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं
कुछ कर्मचारियों ने तो यहां तक आरोप लगाया कि उनके साथ अभद्र और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया।
क्या फिर सवालों के घेरे में वन विभाग की कार्यशैली?
सबसे बड़ा सवाल अब यह उठ रहा है कि —
क्या वन विभाग ऐसे अधिकारियों को लगातार संरक्षण दे रहा है जिनका रिकॉर्ड पहले से विवादों से भरा हुआ है?
एक ओर छत्तीसगढ़ सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की बात करती है, वहीं दूसरी ओर रिश्वतकांड में गिरफ्तार रह चुके अधिकारी लगातार महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ होते दिखाई दे रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि कुछ समय पहले तक ऐसे ही आर.पी. दुबे का नाम रायपुर वनमंडल के महत्वपूर्ण SDO पद के लिए भी चर्चा में था। अब नंदनवन में सामने आए इन आरोपों ने उस पूरी प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
DFO बोले — जांच टीम बनेगी
प्रभारी DFO मयंक पांडेय ने कहा है कि शिकायत के आधार पर जांच टीम गठित की जा रही है और रिपोर्ट आने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। हालांकि उन्होंने रेंजर की शिकायत औपचारिक रूप से मिलने से इनकार किया है।
लेकिन अब सवाल यह है कि —
क्या जांच सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगी, या इस बार वास्तव में विभागीय भ्रष्टाचार और दुर्व्यवहार की परतें खुलेंगी?
विभाग में चर्चा : “क्या ईमानदार अधिकारी फिट नहीं बैठते?”
वन विभाग के भीतर अब यह चर्चा तेज हो गई है कि जो अधिकारी नियमों की बात करते हैं, वे या तो किनारे कर दिए जाते हैं या मानसिक दबाव में रखे जाते हैं।
रेंजर की शिकायत में दर्ज कथित वाक्य —
“घूसखोरी नहीं कर सकते तो दूसरी नौकरी कर लो”
अब पूरे विभाग की कार्यसंस्कृति पर सवाल बनकर खड़ा हो गया है।
अब सबकी नजर जांच पर
नंदनवन में सामने आए इस विवाद ने केवल एक अधिकारी की कार्यशैली पर नहीं, बल्कि पूरे विभागीय सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो मामला सिर्फ प्रशासनिक दुर्व्यवहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि फर्जी बिल, वित्तीय अनियमितता, भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आयाम भी सामने आ सकते हैं।
■ सवालों के घेरे में शासन और वन विभाग की कार्यप्रणाली
सबसे बड़ा प्रश्न अब छत्तीसगढ़ शासन और वन विभाग की कार्यशैली पर खड़ा हो रहा है। क्या विभाग के पास कोई अन्य योग्य और बेदाग SDO/ACF नहीं बचा है, जो ऐसे विवादित अधिकारी को राजधानी रायपुर और नंदनवन जैसे महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ किया गया?
जानकारों की मानें तो शासन और वन विभाग में वर्षों से यह आंतरिक नीति और निर्देश प्रचलित रहे हैं कि —
“भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी, एसीबी/ईओडब्ल्यू द्वारा रंगे हाथों पकड़े गए अथवा जिनके विरुद्ध न्यायालय में प्रकरण लंबित हों, ऐसे अधिकारियों को मुख्यधारा एवं संवेदनशील पदस्थापनाओं से दूर रखा जाएगा।”
इसके बावजूद वर्ष 2018 में एसीबी ट्रैप में पकड़े गए आर.पी. दुबे को न सिर्फ मुख्यधारा में रखा गया, बल्कि राजधानी क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सौंप दी गईं।
अब नंदनवन प्रकरण में सामने आए आरोप —
“मंत्रीजी को पैसा देना है”
ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। विभागीय गलियारों में इस बात को लेकर भी चर्चा तेज है कि यदि किसी अधिकारी द्वारा खुले तौर पर “मंत्री तक राशि पहुंचाने” जैसी बातें कही जा रही थीं, तो यह कहीं न कहीं विभाग के उच्च अधिकारियों और मंत्रालय स्तर तक संभावित सांठगांठ या संरक्षण की ओर भी संकेत करता है।
- भले ही जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो पाए, लेकिन लगातार विवादों और शिकायतों के बाद भी ऐसे अधिकारियों का महत्वपूर्ण पदों पर बने रहना शासन की भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है।
■ छुट्टी के दिन नंदनवन पहुंचे प्रभारी DFO, CCF को सौंपी जांच रिपोर्ट
नंदनवन पक्षी विहार में SDO आर.पी. दुबे के खिलाफ रेंजर एवं कर्मचारियों की शिकायतों के बाद विभाग में हड़कंप मच गया। समाचार पत्रों में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रभारी DFO मयंक पाण्डेय रविवार अवकाश के बावजूद सुबह नंदनवन पहुंचे और कर्मचारियों, रेंजर व संबंधित दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच की।
बताया जा रहा है कि जांच के बाद प्रभारी DFO ने अपनी रिपोर्ट रायपुर वृत्त के CCF मनिवासगन पी. को सौंप दी है। शिकायत में फर्जी बिल बनाने का दबाव, कर्मचारियों से दुर्व्यवहार, फाइलें रोकने तथा “मंत्रीजी को पैसा देना है” जैसे गंभीर आरोप शामिल बताए गए हैं।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, मामले को लेकर अब उच्च स्तर पर चर्चा तेज हो गई है और आगामी दिनों में विभागीय कार्रवाई या विस्तृत जांच के आदेश भी हो सकते हैं।
■ ACB/EOW कोर्ट केस की वर्तमान स्थिति : आर.पी. दुबे के खिलाफ अब भी चल रही न्यायालयीन कार्यवाही
उपलब्ध ई-कोर्ट (ECourts) रिकॉर्ड के अनुसार, वर्तमान में SDO/ACF आर.पी. दुबे के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) द्वारा दर्ज रिश्वतकांड मामले में न्यायालयीन कार्यवाही अब भी जारी है। रिकॉर्ड के अनुसार मामला रायपुर जिला एवं सत्र न्यायालय में लंबित है।
केस से जुड़ी प्रमुख जानकारी :
- केस टाइप : Corruption Cases
- फाइलिंग नंबर : 3794/2024
- रजिस्ट्रेशन नंबर : 04/2024
- फाइलिंग/रजिस्ट्रेशन दिनांक : 29-08-2024
- CNR नंबर : CGRP010082182024
- न्यायालय : 5th Additional District & Sessions Judge, Raipur
आरोपी का नाम :
- R.P. Dubey
दर्ज धाराएं :
मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) के अंतर्गत दर्ज है, जिसमें निम्न धाराएं शामिल हैं —
- धारा 7
- धारा 13(1)(D)
- धारा 13(2)
FIR विवरण :
- थाना : Anti Corruption Bureau (ACB), Raipur
- FIR नंबर : 11/2018
अर्थात, न्यायालय में अब भी प्रकरण विचाराधीन है और आरोप निर्धारण (Charge Argument) की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लंबित प्रकरण वाले अधिकारी को संवेदनशील एवं राजधानी क्षेत्र की जिम्मेदार पोस्टिंग कैसे और किन आधारों पर दी जा रही है।












